EVS Notes : Important EVS Vocabulary

जैविक घटक (Biotic Components) : – किसी भी प्रकार पारिस्थितिक तन्त्र में जन्तु एवं पादप समुदाय साथ – साथ रहते हैं, जो किसी – न – किसी प्रकार से परस्पर सम्बन्धित होकर पोषक संरचना को प्रदर्शित करते हैं।

अजैविक घटक (Abiotic Components) : – किसी भी पारिस्थितिक तन्त्र में पाए जाने वाले सभी निर्जीव पदार्थ उसके अजैविक घटक कहलाते हैं।

स्वपोषी (Autotrophs) : – ऐसे जीवधारी जो प्रकाश – संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपने पोषण हेतु भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं स्वपोषी कहलाते हैं।

परपाषा (Heterotrophs) : – परपोषी के अन्तर्गत वे सभी जीव सम्मिलित हैं, जो भोजन के लिए पादपों व अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। ये अपने पोषण के लिए उत्पादकों द्वारा संश्लेषित भोजन का उपयोग करते हैं। इन्हें उपभोक्ता भी कहते हैं।

बायोम (Biome) : – किसी पारिस्थितिक तन्त्र में पौधों तथा प्राणियों के सम्मिलित रूप को बायोम कहते हैं।

एज प्रभाव (Edge Effect) : – जब दो समुदायों को विभाजित करने वाले इकोटोन की पहचान आसानी से नहीं हो पाती तो इसे एज प्रभाव कहते हैं।

बर्फ रेखा (Snow Line) : – भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर वृक्ष नहीं मिलते केवल बर्फ ही बर्फ दिखती है। इसके बाद केवल धाराएँ और झारियाँ मिलती हैं।

अधिपादप (Epiphytes) : – जब दो अलग – अलग प्रकार के पौधों का सम्बन्ध भोजन आधारित न होकर केवल आवास आधारित होता है तो ऐसे पौधों को अधिपादप कहते हैं।

पारिस्थितिकीय निक (Ecological Niche) : – किसी पारिस्थितिक तन्त्र के निर्माण व इसको चलाने में प्रत्येक जीवधारी एक निश्चित कार्य करता है और इस तन्त्र में प्रत्येक जीवधारी का अपना एक पद होता है पारिस्थितिक तन्त्र में एक पौधे या जन्तु के कार्य को पारिस्थितिक निक कहते हैं।

असमतापी जन्त (Cold Blooded Animal) : – जिन जन्तुओं के शरीर का ताप वातावरण के अनसार घटता – बढता रहता है। उसे असमतापी जन्त कहते हैं अर्थात् असमतापी जन्तुओं के शरीर का ताप गर्मियों में गर्म तथा सर्दियों में ठण्डा हो जाता है। मत्स्य उभयचर तथा सरीसृप या रेंगकर चलने वाले जन्तु असमतापी होते हैं।

हरित मफलर (Green Muffler) : – सड़कों और रेल की पटरियों के किनारे पौधों तथा झाड़ियों की कई कतारें लगाकर ध्वनि प्रदूषण की गतिविधियों को कम करने की व्यवस्था को हरित मफलर कहते हैं।

जैव – सान्द्रण (Bio Magnification) : – अनेक प्रदूषणकारी पदार्थ जैसे DDT आदि सतत् प्रदूषक कहलाते हैं। ये अगर एक बार भी उपयोग में लाये जाते हैं तो लम्बे समय तक हमारे पारिस्थितिकी तन्त्र में बने रहते हैं। इस प्रकार अनेक प्रदूषणकारी पदार्थ हमारी खाद्य श्रृंखलाओं में स्थापित हो जाते हैं। इनके अन्तर्गत कीटनाशक आदि आते है। इनका सान्द्रण क्रमिक रूप से उच्च पोषण स्तर में बढ़ता जाता है, जिसे जैव – सान्द्रण कहते हैं।

जैव – क्षयकारी प्लास्टिक (Biodegradable Plastic) : – सामान्य प्लास्टिक का अपक्षय या अपघटन सूक्ष्य जीव नहीं करते हैं पर जब इसका निर्माण निम्न घनत्व की पाली एथिलीन को मण्ड के साथ मिलाकर करते हैं तो मिटटी में फेंक देने पर दो महीने में इसका जैव – अपक्षय हो जाता है, यह मिट्टी में मिल जाता है।

भोपाल त्रासदी (Bhopal Disaster) : – मिथाइल आइसोसाइनेट को भोपाल त्रासदी संज्ञा से अभिहित किया गया है, क्योंकि दिसम्बर, 1984 में भोपाल में इस गैस से हजारों लोगों की मौत हो गई थी।

भूरी बर्फ (Grey Snow) : – यह नॉर्वे में पाई जाती है। जर्मनी में खनिज क्षेत्र में हुए प्रदूषण के कारण वहाँ की बर्फ भूरी हो गई है।

जीन पुल (Green Pool) : – यह किसी प्रजाति की पूरी जनसंख्या के जीनों का उनके एलल के साथ समग्रता का द्योतक है।

एजेण्ट ऑरेन्ज (Agent Orange) : – अमेरिका द्वारा वियतनाम युद्ध में प्रयुक्त किया गया खरपतवार नाशी का नाम है, जिसने वहाँ के जंगलों तथा वनस्पतियों को तो तबाह किया ही। साथ में मनष्यों में भी कैंसर और विकलांगता का प्रसार किया।

हरित लेखा परीक्षण (Green Audit) : – किसी भी संस्थान या औद्योगिक इकाई की जाँच – पड़ताल इसके द्वारा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को जानने के उद्देश्य से करना ही हरित लेखा परीक्षण या हरित अंकेक्षण कहलाता है।

ईकोचिह्न (Eco mark) : – भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा मिट्टी के घड़े के रूप में स्थापित यह चिह्न ऐसे उत्पादों के लिए दिया जाता है, जिसका उत्पादन और उपयोग पर्यावरण अनुकूल मानकों के आधार पर किया जाता है।

ईको क्लब (Eco Club) : – किशोरों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा चलाया जा रहा अभियान है।

उत्सर्जन व्यापार (Emission Trading) : – क्योटो प्रोटोकॉल में विभिन्न देशों के लिए उत्सर्जन कोटा निर्धारित करने की बात कही गई है जो देश अपने कोटे से अधिक उत्सर्जन कर रहे हैं उनके लिए कटौती का प्रावधान है, जबकि जो देश अपने कोटे से कम का उत्सर्जन कर रहे हैं वे अपनी औद्योगिक गति को तेज कर अधिक उत्सर्जन के लिए स्वतन्त्र होंगे।

यूट्रोफिक (Eutrophic) : – तालाब जैसे वे जल क्षेत्र जिसमें पर्याप्त मात्रा में पोषक पदार्थ होते हैं तथा जो पौधों की तीव्र वृद्धि के लिए उपयुक्त होता है, यूट्रोफिकेशन कहलाती है।

लियाना (Liana) : – यह उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वनों में उगने वाली एक लता है, जो वृक्ष के तने से लिपटकर वृक्ष के ऊपर तक पहुँच जाती है।

अनुक्रमण (Succession) : – जब किसी पारिस्थितिक तन्त्र में एक जैव समुदाय का स्थान कालान्तर में दूसरे जैव समुदाय द्वारा ग्रहण कर लिया – जाता है तो उसे पारिस्थितिकी अनुक्रमण कहते हैं।

बेन्थोस (Benthos) : – जल की सबसे निचली सतह अर्थात् कीचड़ में रहने वाले सूक्ष्य जीवों को बेन्थोस कहते हैं।

इडेफोलॉजी (Edaphology) : – पौधों की वृद्धि और विकास में मृदा की भूमिका का अध्ययन करने वाले विज्ञान को इडेफोलॉजी कहते हैं।

फेरोमोन (Pheromone) : – कीटों में सम्भोग, रास्ता निर्धारण तथा क्षेत्र निर्धारण के लिए कुछ रसायनों का स्राव (Secretion) किया जाता है जिसे फेरोमोन कहते हैं।

बोरियल (Boreal) : – भारत में पाई जाने वाली 40% वनस्पति बाहरी (Exotic) हैं। ये बाहर से लाई गई वनस्पतियाँ अधिकांशतः मूल रूप से चीन से सम्बन्धित हैं और बोरियल कहलाती हैं।

पर्यावरण प्रबन्धन (Environment Management) : – पर्यावरण प्रबन्धन का तात्पर्य है कि पर्यावरण के विभिन्न घटकों के मध्य सन्तुलन की अवस्था को बनाए रखते हुए स्वपोषक तन्त्रों एवं अन्य प्राकृतिक क्रियाओं का संचालन करना।


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