अव्यय (Avyay) Hindi Grammar Study Notes for CTET Exam

CTET 2020 Study notes

 

अव्यय

 

About Course:

अव्यय अविकारी शब्द है, जबकि संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया विकारी शब्द हैं। उन शब्दों को अव्यय कहा जाता है जिनके रूप लिंग वचन, पुरूष, काल आदि के कारण परिवर्तित नहीं होते अर्थात् अपरिवर्तित रहते है। अव्यय का रूपान्तरण नहीं होता, इसी कारण इसे ‘अविकारी हैं-जब तब, किन्तु, परन्तु, इधर, उधर, अभी, अतएब, क्योंकि आदि।

 

अव्यय के भेद

अव्यय चार प्रकार के होते हैं-

(क) क्रिया विशेषण

(ख) सम्बन्ध बोधक अव्यय

(ग) समुच्चय बोधक अव्यय

(घ) विस्मयादि बोधक अव्यय

 

(क) क्रिया विशेषण

वे शब्द जो क्रिया की विशेषता बतलाते है,क्रिया विशेषण कहे जाते हैं। जैसे-

वह वहा टहलता है।

मैं इधर देखता हूँ।

क्रिया विशेषण के भेद- क्रियाविशेषण के भेद प्रयोग के अनुसार, रूप के अनुसार और अर्थ के अनुसार निम्न प्रकार किए जा सकते हैं-

 

अ. प्रयोग के अनुसार क्रिया विशेषण प्रयोग के आधार पर क्रियाविशेषण तीन प्रकार के होते हैं-

  1. साधारण क्रियाविशेषण
  2. संयोजक क्रियाविशेषण
  3. अनुबद्ध क्रियाविशेषण

 

ब. रूप के अनुसार क्रिया विशेषण

रूप के अनुसार क्रिया विशेषण तीन प्रकार के बताए गए हैं-

  1. मूल
  2. यौगिक
  3. स्थानीय

 

(ख) सम्बन्धबोधक अव्यय

जिन अव्वय शब्दों से संज्ञा अथवा सर्वनाम का वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ सम्बन्ध जाना जाता है, वे सम्बन्धबोधक अव्यय कहलाते हैं। अर्थ के अनुसार सम्बन्ध-बोधक अव्यय के ये भेद हैं-

  1. कालवाचक- पहले, बाद, ओग, पीछे।
  2. स्थानवाचक- बाहर, भीतर, बीच, ऊपर, नीचे।
  3. दिशावाचक- निकट पास, समीप, ओर, सामने।
  4. साधनवाचक- निमित्ति, द्वारा, जरिये।
  5. विरोधवाचक- उलटे, विरूद्ध, प्रतिकूल।
  6. व्यतिकवाचक- सिवा, अलावा, बिना, बगैर, अतिरित्त रहित।
  7. उद्देश्यवाचक- लिए, वास्ते, हेतु, निमित्त!
  8. साचर्यवाचक- समेत, संग, साथ, सहित।
  9. विशयवाचक- विषय, बाबत, लेख।
  10. संग्रहवाचक- समेत, भर, तक।
  11. विनिमयवाचक- प्लेट, बदले, जगह, एवज।
  12. सादृश्यवाचक- समान तरह, भाँति, नाई।।
  13. तुलनावाचक- अपेक्षा, वनस्पित, आगे सामने।
  14. कारणवाचक- कारण, पेरशानी से, मारे

 

क्रियाविशेषण और सम्बन्धबोधक अव्यय में अन्तर

जब इनका प्रयोग संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ होता है तब ये सम्बन्धबोधक अव्यय होते हैं और जब ये क्रिया की विशेषता प्रकट करते हैं तब क्रियाविशेषण होते हैं।

जैसे-

  1. अन्दर आओ। (क्रियाविशेषण)
  2. दुकान के भीतर आओं (सम्बन्धबोधक अव्यय)

 

(ग) समुच्चयबोधक अव्यय

दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को मिलाने वाले अव्यय समुच्चबोधक अव्यय कहलाते हैं। इन्हें ‘योजक’ भी कहते हैं।

इसके तीन भेद है-

  1. संयोजक

जो अव्यय दो अथवा अधिक शब्दों या वाक्यों को जोड़ते हैं, वे संयोजक कहलाते हैं। जैसे-और, एवं, व आदि।

मैं और राम काम पर जाएँगे।

राम और लक्ष्मण तथा सीता ने पंचवटी में विश्राम किया। इन दोनों वाक्यों में ‘और’, ‘तथा’ शब्द ‘जोड़ने’ के अर्थ में आए हैं, ये संयोजक है।

 

  1. विभाजक

जो अव्यय दो अथवा अधिक वस्तुओं में किसी एक का त्याग या ग्रहण बताते हैं, वे विभाजक कहलाते हैं। जैसे- किन्तु, परन्तु, अगर, ताकि, क्योंकि, इसलिए तथापि कि-तो आदि।

करो या मरो

नित्य आराम करो ताकि स्वस्थ रहो।

इस दोनों वाक्यों में ‘या’, ‘ताकि’ शब्द भेद प्रकट करते हुए जोड़ने के अर्थ में आए हैं। अतः ये विभाजक हैं।

 

  1. विकल्पसूचक

जो अव्ययविकल्प का बोध कराते हैं, ये विकल्पसूचक कहलाते हैं। जैसे-या, अन्यथा, अथवा, न कि, या-या इत्यादि।

तुम आना या मैं आऊँगा।

तुम पैसे का प्रबन्ध कर लो अन्यथा मुझे कुछ और करना पड़ेगा।

इन दोनों वाक्यों में ‘या’ और ‘अन्यथा’ शब्द आए हैं जोकि विकल्प का बोध करते हैं। अतः ये विकल्पसूचक हैं।

 

(घ) विस्मयादिबोधक अव्यय

जिन शब्दों से हर्ष, शोक, विस्मय, ग्लानि, घृणा, लज्जा आदि भाव प्रकट होते हैं, वे विस्मयादिबोधक अव्यय कहलाते हैं। उन्हें ‘द्योतक’ भी कहते हैं। प्रकट होने वाले भाव के आधार पर इसके निम्नलिखित भेद हैं-

  1. हर्षबोधक- अहा! धन्य!, वाह-वाह! ओह!, वाह!, शाबाश!
  2. शोकबोधक- आह!, हाय!, हाय-हाय!, हा, त्राहि-त्राहि बाप रे।
  3. विस्मयाबोधक- हैं! ऐं!, ओहो!, अरे, वाह!
  4. तिरस्कारबोधक- छिः।, हट!, धिक!, धत्!, छि छिः!, चुप!
  5. स्वीकृतिबोध- हाँ-हाँ!, अच्छा!, ठीक!, जी हाँ!, बहुत अच्छा!
  6. सम्बोधनबोधक- रे!, री!, अरे!, अरी!, ओ!, अजी!, हेला!,
  7. आशीर्वादबोधक- दीर्घायु हो!, जीते रहो!

 

निपात

निश्चित शब्द, शब्द-अथवा पूरे वाक्य को अन्य भावार्थ प्रदान करने हेतु जिन शब्दों का प्रयोग होता है, उन्हें निपात कहते हैं।

जो अव्यय किसी शब्द या पद के बाद लगकर उसके अर्थ में विशेष प्रकार का बल भर देते हैं, वे निपात या अवधारक अवयय कहलाते हैं। हिंदी में प्रचलित महत्त्वपूर्ण निपात निम्नलिखित है:

 

  1. ही

इसका प्रयोग व्यक्ति, स्थान या बात पर बल देने के लिए किया जाता है; जैसे:

राजेश दफ़्तर ही जाएगा।

तुम ही वहाँ जाकर यह काम करोगे।

अलका ही प्रथम आने के योग्य है।

 

  1. भी

इसका प्रयोग व्यक्ति, स्थान व वस्तु के साथ अन्य को जोड़ने के लिए किया जाता हैः जैसेः

राम के साथ श्याम भी जाएगा।

दिल्ली के अलावा मुंबई भी मुझे प्रिय है।

चावल के साथ दाल भी आवश्यक है।

 

  1. तक

किसी व्यक्ति अथवा कार्य आदि की सीमा निश्चित करता है; जैसेः

वह शाम तक आएगा।

दिल्ली तक मेरी पहुँच है।

वह दसवीं तक पढ़ा हुआ है।

 

  1. केवल/मात्र

केवल या अकेले के अर्थ को महत्त्व देने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है; जैसेः

प्रभु का नाम लेने मात्र से कष्ट दूर हो जाते हैं।

केवल तुम्हारे आने से काम न चलेगा।

दस रूपये मात्र लेकर क्या करोंगे।

 

  1. भर

यह अव्यय, सीमितता और विस्तार व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है; जैसेः

वह रातभर रोता रहा।

मैं जीवनभर उसका गुलाम बनकर रहा।

विश्वभर में उसकी ख्याति फैली हुई है।

 

  1. तो

क्रिया के साथ उसका परिणाम व मात्र को प्रकट करने के लिए इस अव्यय का प्रयोग जाता है; जैसे:

तुम आते तो में चलता।

वर्षा होती तो फसल अच्छ होती।

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